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Poems

आठवणीत तुझ्या

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मनाचा तर निर्धार आहे
सांगायचं आहे खूप काही,
तुझ्या नकाराचा विचारच 
मला सांगू देत नाही.

होकार दिलास तरीही तू मला
लपून-छपुनच भेटणार,
एकाठिकाणी बसल्यावर आपण
औपचरिकच बोलणार.

विचार केल्यावर वाटतं
त्या प्रेमाचा काय फायदा,
जर आडवा येणार असेल
समाजाचा कायदा.

येउन जाऊन काय तर,
जातीचीच भिंत ऊभी राहणार.
नंतर साहाजिकच तू मन मोडून
समाजाच्या नजरेने पाहणार.

मग प्रेमाविषयी लिहिणारा मी
प्रेमभंगावर लिहू पाहीन,
दिवस-रात्र प्रेमाला मग
नावं ठेवत राहीन.

म्हणून माझ्या भावनांना
अव्यक्तच राहू दे,
तुझ्या आठवणींनी प्रत्येक क्षण
जातोय तसा जावू दे.

#Mature By Mind Kid At H3art Rude From Outside Caring From Inside..!

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Poems

ना जाने क्यों

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ना जाने क्यों ये शहर मुझे पसंद नहीं आ रहा
ना जाने क्यों ये शहर मुझे रास नहीं आ रहा
ना जाने क्यों यहां की गलिया मुझे मेरी मंजिल तक नहीं पहुंचा रही
ना जाने क्यों यहां के रास्ते मुझे समझ नहीं आ रहे
ना जाने क्यों…..
यूं तो यहा भी इंसान ही र‍हते हैं फिर भी ना जाने क्यों किसी का साथ मुझे नजर नहीं आ रहा…….
ना जाने क्यों यह शहर मुझे पसंद नहीं आ रहा..
ना जाने क्यों ये शहर मुझे रास नहीं आ रहा….
ना जाने क्यों यहां के भाषा के शब्द मुझे समझ में नहीं आ रहे..
ना जाने क्यों यहां की भीड़ में भी अकेली हु…
ना जाने क्यों यहां हर अपना भी पराया लग रहा है….
ना जाने क्यों……
यूं तो इस शहर ने भी दी है कुछ हसीन यादें फिर भी ना जाने क्यों इन यादों से वास्ता नजर नहीं आ रहा……
ना जाने क्यों यह शहर मुझे पसंद नहीं आ रहा..
ना जाने क्यों ये शहर मुझे रास नहीं आ रहा..
ना जाने क्यों यहां के सुरज मे उतना तेज नहीं जो मुझे रोशनी दे सके….
ना जाने क्यों यहां के चाँद मे उतनी ठंडक नहीं जो मेरे अंदर की गर्मी को ठंडा कर सके…..
ना जाने क्यों यहाँ की नदियां मेरी प्यास नहीं बुझा पा रही….
ना जाने क्यों….
यूं तो यहाँ की जमीन भी बंजर नहीं फिर भी ना जाने क्यों यहां का कोई रंग भी मुझे भा नहीं रहा……
ना जाने क्यों यह शहर मुझे पसंद नहीं आ रहा..
ना जाने क्यों ये शहर मुझे रास नहीं आ रहा..

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Poems

Lost forever to disarray

Turn your ears deaf,
And eyes blind,
For what is to be felt
Needs only a heart seeking another to bind.

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Lost

Here,
Hold my hand tight,
And walk by my side,
Away from this world, away from its sight.

Turn your ears deaf,
And eyes blind,
For what is to be felt
Needs only a heart seeking another to bind.

The redness of cheeks,
And the echo of my heart’s beat,
Your hands would do
To feel the flaring burn and the wavering tide.

I started to love you,
With a depth deeper than sea,
A force fiercer than storm,
And a warmth warmer than fire.

Days passed and so did months,
Time flew in a way I never reckoned.
Jewels fainted and castles crumbled over time,
Then who were humans to not have stumbled and tumbled?

Were you not the one
To promise and vow?
To never leave my side,
To never let me wonder the why and the how?

And yet you did all,
Effortlessly and mercilessly.
To live for oneself
You stated is neither selfish nor silly.

I let the words sink in,
I let the reality shatter my fantasy.
For what I had dreamt of,
Would now be another broken fragment of my fancy.

When met for the last time,
You did not smile, nor did you cry.
Just whispered in my ear,
An apology so phony that made my whole self dry.

I saw you walking away,
With a stride full of pride.
Never looking back at a heart blue,
A belief gray and a soul lost forever to disarray.

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Poems

खुद से मिलना

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सोचा नहीं था …..
की तुमसे मिलने पे खुद से मिल लुंगी ….
तुम्हे समझाते समझाते खुद भी समझ लुंगी ……
तुम्हारी तकलीफे सुलजाते सुलजाते खुद को भी सुलजा लुंगी …….
सोचा नहीं था की आज फिर से जी लूँगी .. ..
#motivation #nightwalk #icecream

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